भारत में हर साल हजारों स्टार्टअप शुरू होते हैं, लेकिन आंकड़े डराने वाले हैं – 90% स्टार्टअप पहले 5 सालों में बंद हो जाते हैं। और इनमें से 65% के फेल होने की वजह ‘मार्केट’ या ‘फंडिंग’ नहीं, बल्कि फाउंडर्स के बीच के आपसी झगड़े और कमजोर कागजी कार्रवाई (Legal Documentation) होती है।
अक्सर नए उद्यमी प्रॉडक्ट बनाने में महीनों लगा देते हैं, लेकिन लीगल पेपर्स को “बाद का काम” मानकर टाल देते हैं। यही लापरवाही Housing.com और BharatPe जैसे बड़े विवादों को जन्म देती है। अगर आप अपना स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं, तो ये 10 डॉक्यूमेंट्स आपके लिए सिर्फ कागज नहीं, बल्कि ‘लाइफ जैकेट’ हैं।
Tier 1: वो कागज जिनके बिना कंपनी का ‘जन्म’ ही नहीं होता
शुरुआती 30 दिनों में अगर आपके पास ये नहीं हैं, तो कानूनी तौर पर आपका बिजनेस अस्तित्व में ही नहीं है।
Certificate of Incorporation (COI): यह आपकी कंपनी का ‘बर्थ सर्टिफिकेट’ है। इसके बिना न बैंक अकाउंट खुलेगा, न ही आप किसी को नौकरी पर रख पाएंगे। यह साबित करता है कि ROC (Registrar of Companies) में आपकी कंपनी दर्ज है।
MOA और AOA: मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (MOA) बताता है कि कंपनी क्या काम करेगी, और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AOA) बताता है कि कंपनी कैसे चलेगी। बिना AOA के, कोई भी फाउंडर मनमाने ढंग से फैसले ले सकता है, जिससे बाद में भारी विवाद होते हैं।
Founders Agreement (सबसे जरूरी): इसे स्टार्टअप का ‘प्री-नप’ (Prenup) कहें तो गलत नहीं होगा। Housing.com में 12 फाउंडर्स थे लेकिन कोई एग्रीमेंट नहीं था, नतीजा—₹200 करोड़ से ज्यादा का नुकसान और झगड़े। यह डॉक्यूमेंट तय करता है कि किसके पास कितनी इक्विटी है, कौन क्या फैसला लेगा, और अगर कोई छोड़कर गया तो उसके शेयर्स का क्या होगा।
PAN और TAN: यह कंपनी बनते ही अपने आप मिल जाता है। टैक्स भरने और बैंक ट्रांजैक्शन के लिए यह अनिवार्य है।
Tier 2: आईडिया और टीम को चोरी होने से बचाएं
जब आप हायरिंग शुरू करते हैं या इन्वेस्टर्स से मिलते हैं, तो खतरा बढ़ता है। ये डॉक्यूमेंट्स आपको सुरक्षित रखते हैं।
Employment Contracts: कई बार डेवलपर्स दावा करते हैं कि “कोड मैंने लिखा है, तो यह मेरा है।” एम्प्लॉयमेंट कॉन्ट्रैक्ट में ‘IP Assignment’ क्लॉज यह सुनिश्चित करता है कि कंपनी का काम कंपनी का ही रहे। साथ ही, ‘Non-compete’ क्लॉज कर्मचारी को नौकरी छोड़ने के तुरंत बाद कॉम्पिटिटर के पास जाने से रोकता है।
Non-Disclosure Agreement (NDA): अपना आईडिया किसी को भी (इन्वेस्टर या एडवाइजर) बताने से पहले NDA साइन करवाएं। वरना, आपका आईडिया चोरी हो सकता है और आपके पास कानूनी तौर पर कुछ करने का रास्ता नहीं बचेगा।
IP Assignment Agreement: इन्वेस्टर्स सबसे पहले यही चेक करते हैं कि क्या कंपनी अपने प्रोडक्ट/कोड की मालिक है? यह डॉक्यूमेंट फाउंडर्स और कंपनी के बीच स्पष्ट करता है कि सारी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) कंपनी के नाम पर है, फाउंडर के निजी नाम पर नहीं।
Tier 3: फंडिंग और ग्राहकों के लिए जरूरी
जब आप पैसा उठाने या कस्टमर बनाने जाते हैं, तब इनकी जरूरत पड़ती है।
Shareholders Agreement: यह फाउंडर्स एग्रीमेंट से अलग है। इसमें इन्वेस्टर्स के अधिकार, वोटिंग राइट्स और शेयर ट्रांसफर के नियम होते हैं। BharatPe का विवाद इसी डॉक्यूमेंट में स्पष्टता न होने के कारण बढ़ा था।
Co-Founder Exit Clause: अगर कोई को-फाउंडर 2 साल बाद काम करना बंद कर दे, तो क्या उसके पास सारे शेयर्स रहेंगे? यह क्लॉज तय करता है कि जाने वाले फाउंडर के शेयर्स कैसे वापस (Buyback) लिए जाएंगे।
Privacy Policy: अगर आपकी वेबसाइट या ऐप है जो यूजर का डेटा (नाम, नंबर) लेती है, तो यह कानूनन अनिवार्य है। इसके बिना आपको भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है और कस्टमर का भरोसा भी टूटता है।
विशेषज्ञों की मानें तो लीगल डॉक्यूमेंट्स पर खर्च किए गए ₹50,000 आपको भविष्य में करोड़ों के नुकसान और कोर्ट-कचहरी के चक्करों से बचा सकते हैं।








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