ईरान-अमेरिका युद्ध का साया: भारत में कच्चा तेल बिगाड़ेगा खेल, जानिए किन 5 बिजनेस पर गिरेगी गाज

March 1, 2026 6:17 PM
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मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका के बीच फुल-स्केल युद्ध की आशंकाओं ने दुनियाभर के शेयर बाजारों और बिजनेस कम्युनिटी की नींद उड़ा दी है। आम भारतीय और निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर यह युद्ध भड़कता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार और आम आदमी की जेब पर इसका क्या असर होगा?

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत और ईरान के बीच सीधा व्यापार अब बहुत कम रह गया है, लेकिन इस युद्ध का ‘इनडायरेक्ट’ असर भारतीय अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका दे सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास किसी भी तरह की रुकावट भारत में महंगाई का बम फोड़ सकती है।

सीधे व्यापार पर असर सीमित क्यों है?

अगर हम आंकड़ों की बात करें, तो भारत और ईरान के बीच का सीधा व्यापार अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद से काफी सिकुड़ चुका है। साल 2018-19 में जहां यह व्यापार 17-18 अरब डॉलर (Billion USD) का था, वह 2022-25 के बीच घटकर सिर्फ 1.6 से 2.3 अरब डॉलर ही रह गया है।

वर्तमान में, ईरान के साथ भारत का व्यापार हमारे कुल विदेशी व्यापार का मात्र 0.1% से 0.2% है। इसलिए, मैक्रो लेवल पर सीधे एक्सपोर्ट या इंपोर्ट का बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। हालांकि, जो भारतीय कंपनियां ईरान को बासमती चावल, चाय, फल, फार्मास्यूटिकल्स और मशीनरी एक्सपोर्ट करती हैं, उनके पेमेंट फंसने और शिपिंग में देरी का जोखिम जरूर बढ़ गया है।

कच्चा तेल: अर्थव्यवस्था के लिए असली टेंशन

भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल (Crude Oil) आयात करता है। ईरान या होर्मुज के आसपास कोई भी सैन्य संघर्ष ब्रेंट क्रूड की कीमतों में आग लगा सकता है। और यहीं से भारत के लिए असली परेशानी शुरू होती है।

आर्थिक विश्लेषकों का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) जीडीपी के 0.3% तक बढ़ जाता है। इतना ही नहीं, इससे खुदरा महंगाई (CPI Inflation) में 25-30 बेसिस पॉइंट्स का इजाफा होता है। इसका सीधा असर रुपये की कमजोरी और रिजर्व बैंक (RBI) की ब्याज दरों पर पड़ेगा, जिससे लोन महंगे हो सकते हैं।

किन सेक्टर्स पर गिरेगी गाज?

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ता है जिनका कच्चा माल सीधे तौर पर पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़ा है।

  • एविएशन और लॉजिस्टिक्स: हवाई ईंधन (ATF) और डीजल के दाम बढ़ने से एयरलाइंस, रोड ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स कंपनियों का मार्जिन बुरी तरह गिरेगा। टिकट और माल ढुलाई महंगी होने से डिमांड पर असर पड़ेगा।
  • पेंट, टायर और केमिकल्स: एशियन पेंट्स, बर्जर पेंट्स जैसी कंपनियों के साथ-साथ टायर और प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी।
  • ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs): एचपीसीएल (HPCL), बीपीसीएल (BPCL) और इंडियन ऑयल को महंगे कच्चे तेल का नुकसान उठाना पड़ेगा क्योंकि रिटेल पेट्रोल-डीजल की कीमतें सरकार द्वारा नियंत्रित होती हैं।

चांदी किसकी और नुकसान किसका?

जहां एक तरफ युद्ध से कई सेक्टर्स खून के आंसू रोएंगे, वहीं कुछ कंपनियों की चांदी भी हो सकती है। ओएनजीसी (ONGC) और ऑयल इंडिया (Oil India) जैसी अपस्ट्रीम ऑयल एक्सप्लोरेशन कंपनियों को कच्चे तेल के महंगे होने का सीधा फायदा मिलता है और इनके शेयरों में तेजी देखने को मिल सकती है।

बाजार के जानकारों का कहना है कि ऐसे माहौल में डिफेंस और एनर्जी से जुड़े शेयर आउटपरफॉर्म कर सकते हैं, जबकि रेट-सेंसिटिव सेक्टर्स (जैसे ऑटो और रियल एस्टेट) पर दबाव देखा जा सकता है।

मिडिल ईस्ट कनेक्शन और चाबहार पोर्ट

खाड़ी देशों (UAE, सऊदी अरब आदि) में लाखों भारतीय कामगार रहते हैं। युद्ध का क्षेत्र अगर फैलता है, तो वहां से आने वाले रेमिटेंस (Remittances), कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स और पर्यटन पर भारी चोट पहुंचेगी।

इसके अलावा, भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम ‘चाबहार पोर्ट’ (Chabahar Port) और ईरान के जरिए कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स पर काम रुक सकता है, जो भारत के लॉन्ग-टर्म लॉजिस्टिक्स प्लान के लिए एक बड़ा झटका होगा। भारतीय बिजनेस घरानों को अब सप्लाई चेन को डायवर्सिफाई करने और वर्किंग कैपिटल बफर बढ़ाने पर जोर देना होगा।

Lakshay Pratap

मैं लगभग 4 सालो से ऑनलाइन बिज़नेस और ऑफलाइन बिज़नेस पर काम कर रहा हूँ, और में ऑफलाइन बिज़नेस की सबसे बड़ी समस्या यानी बिज़नेस के लिए जरुरी प्रोसेस और मार्केटिंग पर बहुत ज्यादा फोकस्ड हूँ। मेरे आर्टिकल्स से आपको बहुत फायदा मिलेगा।

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