क्या MSME लोन अब सस्ते या महंगे होंगे? RBI ने कहा बैंकें अब External Benchmark से जोड़ें

February 5, 2026 11:11 AM
msme loan external benchmark 3 month reset emi impact

भारत में व्यापार करने वालों के लिए अब तक बैंक लोन का मतलब होता था- एक बार लोन लिया और फिर साल भर तक उसकी ईएमआई (EMI) की चिंता से मुक्ति। लेकिन अब खेल बदल गया है। अब आपके लोन की ब्याज दरें ‘एक्सटर्नल बेंचमार्क’ (जैसे RBI की रेपो रेट) से जुड़ गई हैं और इसमें हर 3 महीने में बदलाव (Reset) होगा।

इसका सीधा मतलब यह है कि अगर रिजर्व बैंक (RBI) ब्याज दरें घटाता है, तो उसका फायदा आपको साल भर इंतजार किए बिना तुरंत मिलेगा। लेकिन, सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि अगर दरें बढ़ती हैं, तो आपकी जेब पर बोझ भी उतनी ही जल्दी बढ़ेगा।

यह खबर आपके लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

एक छोटे बिजनेसमैन के लिए ₹5,000 की ईएमआई बढ़ना भी मायने रखता है। पहले बैंक MCLR (Marginal Cost of Funds Based Lending Rate) जैसे सिस्टम पर चलते थे, जहाँ बैंक अपनी मर्जी से धीरे-धीरे दरें कम करते थे।

अब क्या बदलेगा?

अनिश्चितता (Volatility): अब आपका मंथली बजट थोड़ा ऊपर-नीचे हो सकता है। आपको अपनी वर्किंग कैपिटल (Working Capital) को इसी हिसाब से प्लान करना होगा।

पारदर्शिता (Transparency): अब बैंक बहाने नहीं बना पाएंगे। अगर RBI ने रेट कम किया, तो 3 महीने के अंदर आपका लोन सस्ता होना ही चाहिए।

पुराने लोन वाले क्या करें? स्विच करें या नहीं?

अगर आपका लोन पुराना है (MCLR पर आधारित), तो बैंक आपको इस नए सिस्टम में आने का विकल्प देंगे। यहाँ आपको एक ‘एक्सपर्ट’ की तरह सोचना होगा:

  1. मार्केट का मिजाज देखें: अगर आपको लगता है कि आने वाले समय में देश में ब्याज दरें कम होंगी, तो तुरंत नए सिस्टम में स्विच करना फायदेमंद है।
  2. एकमुश्त फीस: स्विच करने के लिए बैंक छोटी सी प्रोसेसिंग फीस मांग सकते हैं। गणित लगाइए कि क्या ब्याज में होने वाली बचत उस फीस से ज्यादा है?
  3. कैश रिजर्व: चूंकि दरें हर 3 महीने में बदल सकती हैं, इसलिए अपने पास थोड़ा ‘बफर’ पैसा रखें ताकि अगर ईएमआई बढ़े तो बिजनेस की ऑपरेशन्स न रुकें।

स्टार्टअप्स और नए व्यापारियों के लिए सलाह

नए दौर के स्टार्टअप्स के लिए यह एक बेहतरीन मौका है। शुरुआती सालों में जब फंड्स की कमी होती है, तब ब्याज दरों में 0.25% या 0.50% की गिरावट भी काफी राहत देती है।

प्रो टिप: जब भी आप नया लोन लें, बैंक से पूछें कि उनका ‘स्प्रेड’ (Spread) कितना है। एक्सटर्नल बेंचमार्क तो सबके लिए समान है, लेकिन बैंक उसके ऊपर जो अपना मुनाफा (मार्जिन) जोड़ता है, वही आपकी असली लागत तय करेगा।

एक उदाहरण से समझें गणित

मान लीजिए आपने 11% की दर पर MSME लोन लिया है।

  • स्थिति 1: अगर 3 महीने बाद रेपो रेट 0.50% गिरता है, तो आपकी ब्याज दर घटकर 10.5% हो जाएगी।
  • स्थिति 2: अगर रेपो रेट 0.50% बढ़ता है, तो आपकी दर बढ़कर 11.5% हो जाएगी। पुराने सिस्टम में इस बदलाव के लिए आपको 6 से 12 महीने का इंतजार करना पड़ता था, लेकिन अब यह काम हर 90 दिनों में होगा।

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आगे का रास्ता: क्या यह बदलाव शुभ है?

लॉन्ग टर्म में यह भारतीय MSME सेक्टर के लिए अच्छा है। यह बैंकों को ज्यादा जवाबदेह बनाता है। हालांकि, छोटे व्यापारियों को अब थोड़ा ज्यादा “फाइनेंशियल अवेयर” होना पड़ेगा। आपको सिर्फ अपना प्रोडक्ट नहीं बेचना, बल्कि देश की इकोनॉमी और RBI के फैसलों पर भी नजर रखनी होगी।

जितेन्द्र सिंह

मैं पिछले 3 सालों से बिज़नेस न्यूज़ और मार्केट अपडेट्स पर लिख रहा हूँ। मैं नई नीतियों, नियमों और ताज़ा बिज़नेस घटनाओं पर गहराई से रिसर्च करता हूँ। मेरे आर्टिकल्स से आपको सही और ताज़ी जानकारी मिलेगी।

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