गांव से ग्लोबल: कैसे 40,000 कारीगरों ने ‘जयपुर रग्स’ को अरबों का ब्रांड बना दिया?

December 5, 2025 11:06 PM
jaipur rugs success story nand kishore chaudhary business model

भारत की सबसे प्रेरणादायक बिज़नेस कहानियों में से एक जयपुर रग्स (Jaipur Rugs) ने हाल ही में अपने विस्तार और वित्तीय प्रदर्शन से सबका ध्यान खींचा है। यह सिर्फ एक कारपेट कंपनी नहीं है, बल्कि एक ऐसा सामाजिक-आर्थिक आंदोलन है जिसने 40,000 से अधिक ग्रामीण कारीगरों जिनमें से 85% महिलाएँ हैं, के जीवन को बदल दिया है।

सरकारी रिपोर्टों और विशेषज्ञों के अनुसार, कंपनी ने वित्तीय वर्ष 2023-24 में लगभग ₹975 करोड़ का ग्रुप टर्नओवर हासिल किया है। इस आंकड़े से पता चलता है कि यह ब्रांड गाँव के दो करघों (looms) से शुरू होकर आज 60 से अधिक देशों में अपना कारोबार फैला चुका है, जो ग्लोबल लग्जरी मार्केट में भारत की धमक बता रहा है।

बिज़नेस मॉडल जिसने दुनिया बदली

जयपुर रग्स की सफलता का राज उसके अनोखे ‘कारीगर-केंद्रित’ (Artisan-First) बिज़नेस मॉडल में छिपा है। कंपनी ने पारंपरिक कपड़ा उद्योग की शोषणकारी प्रणाली को तोड़ते हुए एक विकेन्द्रीकृत (decentralized) मॉडल अपनाया।

  • बिचौलियों का अंत: कंपनी सीधे कारीगरों के साथ काम करती है, बिचौलियों को हटाकर यह सुनिश्चित करती है कि कारीगरों को उनके काम का पूरा और उचित मेहनताना मिले।
  • होम-बेस्ड वर्क: कारीगर अपने घरों में रहकर काम करते हैं। इससे उन्हें आजीविका कमाने के लिए पलायन नहीं करना पड़ता और वे अपने परिवार के साथ रह पाते हैं।
  • महिलाओं का सशक्तीकरण: कारीगरों में अधिकांश महिलाएँ हैं, जिन्हें कंपनी प्रशिक्षण, कच्चा माल और डिज़ाइन संबंधी जानकारी देती है। इसने उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘वर्टिकली इंटीग्रेटेड’ मॉडल है, जहाँ ऊन की सोर्सिंग से लेकर अंतिम धुलाई तक का काम कंपनी की देखरेख में होता है। एक कालीन बनने में लगभग 180 लोगों के हाथों से गुजरता है, जो इसकी गुणवत्ता और विशिष्टता को साबित करता है।

5000 रूपये का कर्जा लेकर शुरू किया था धन्धा

जयपुर रग्स की ग्रोथ स्टोरी किसी सपने से कम नहीं है। संस्थापक नंद किशोर चौधरी ने 1978 में ₹5,000 का कर्ज़ लेकर, राजस्थान के चुरू ज़िले में दो करघों के साथ इसकी शुरुआत की थी।

  1. शुरुआती संघर्ष: 1986 तक, उन्होंने बिचौलियों को हटाकर सीधे अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में निर्यात करना शुरू कर दिया।
  2. टर्नअराउंड: 1999 में, एक व्यावसायिक विभाजन के बाद उन्होंने जयपुर रग्स (तब जयपुर कारपेट्स) की औपचारिक स्थापना की। पहले साल निर्यात से लगभग ₹5 करोड़ का राजस्व मिला था।
  3. ग्लोबल पहचान: 2006 में, कंपनी को अमेरिका में “America’s Magnificent Carpet Award” मिला, जिसने इसे वैश्विक पहचान दिलाई।
  4. मौजूदा टर्नओवर: 2024 तक, यह ग्रुप टर्नओवर ₹975 करोड़ तक पहुँच चुका है, जिसमें से लगभग 87% कमाई अंतराष्ट्रीय सेल से आता है।

कंपनी का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में वह ₹1,000 करोड़ के राजस्व के आंकड़े को पार करे, जिसके लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाज़ारों में 15-20% की ग्रोथ दर का अनुमान है।

40000 ग्रामीण कारीगरों की जिंदगी बदल गयी

इस बिज़नेस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा उन 40,000 से ज़्यादा ग्रामीण कारीगरों को हुआ है जो इस नेटवर्क का हिस्सा हैं। जयपुर रग्स इन कुछ इस तरह से उनकी जिंदगी बदल दी :

  • स्थिर आय: कारीगरों को नियमित मासिक वेतन मिलता है, जिससे उनकी आर्थिक असुरक्षा खत्म हुई है।
  • सामाजिक उत्थान: महिलाएँ अब अपनी कमाई से अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेज रही हैं और परिवार के अहम फैसले ले रही हैं, जिससे ग्रामीण समाज में उनका स्थान मजबूत हुआ है।
  • हुनर का सम्मान: कंपनी ने ‘Kavi’ जैसे डिज़ाइन प्लेटफॉर्म लॉन्च किए हैं, जहाँ कारीगरों को डिज़ाइन बनाने की आज़ादी दी जाती है, जिससे उनका हुनर और रचनात्मकता विश्व मंच तक पहुँचती है।

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जयपुर रग्स ने साबित कर दिया है कि सामाजिक प्रभाव (Social Impact) और लाभदायक व्यवसाय (Commercial Profitability) एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। यह भारत के MSME और ग्रामीण उद्यमिता के लिए एक नया ब्लू-प्रिंट है।

सलोनी ठाकर

मैं 3 सालों से सफल उद्यमियों और कंपनियों की कहानियाँ लिख रही हूँ। मैं हर हफ्ते नई-नई प्रेरक कहानियाँ ढूँढकर शेयर करती हूँ। मेरे आर्टिकल्स पढ़कर आप दूसरों की यात्रा से सीख और मोटिवेशन पा सकेंगे।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

1 thought on “गांव से ग्लोबल: कैसे 40,000 कारीगरों ने ‘जयपुर रग्स’ को अरबों का ब्रांड बना दिया?”

Leave a Comment