याद है जब त्योहारों, शादियों या कॉरपोरेट इवेंट्स में गिफ्ट का मतलब सिर्फ काजू-कतली या सोनपपड़ी का डिब्बा हुआ करता था? भारतीय बाज़ार में अब यह ट्रेंड तेज़ी से बदल चुका है।
लोग अब सिर्फ सामान नहीं देते, वे ‘एक्सपीरियंस’ और ‘पर्सनलाइज़ेशन’ गिफ्ट करते हैं। साल 2024 में भारत का गिफ्टिंग मार्केट ₹75,000 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुका है। और 2030 तक यह एक विशाल इंडस्ट्री बनने जा रहा है।
लेकिन इस खबर में असली ट्विस्ट क्या है? इस बड़े मार्केट कैप का फायदा सिर्फ बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां नहीं उठा रही हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा टियर-2 और टियर-3 शहरों में बैठे छोटे बिज़नेस ओनर्स और होम-प्रेन्योर्स (Home-preneurs) को मिल रहा है।
आइए समझते हैं कि 2026 में कस्टमाइज़्ड गिफ्ट हैंपर बिज़नेस क्यों एक ‘लो-इन्वेस्टमेंट, हाई-रिटर्न’ गोल्डमाइन बन चुका है और आप इससे क्या सीख सकते हैं।
यह मार्केट इतनी तेज़ी से क्यों बदल रहा है?
पिछले कुछ सालों में कंज्यूमर बिहेवियर में एक बड़ा शिफ्ट आया है। कोविड के बाद से लोग हेल्थ को लेकर जागरूक हुए हैं। कोई भी अब अपने क्लाइंट या मेहमानों को चीनी से भरी मिठाइयां नहीं देना चाहता।
इसकी जगह प्रीमियम रोस्टेड ड्राई फ्रूट्स, हर्बल टी, ऑर्गेनिक स्नैक्स और अरोमा कैंडल्स ने ले ली है। इसके अलावा, इंस्टाग्राम कल्चर ने ‘पैकेजिंग’ और ‘प्रेजेंटेशन’ को प्रोडक्ट से भी ज्यादा अहम बना दिया है।
एक और बड़ा कारण है ‘एक्सक्लूसिविटी’। अगर किसी बॉक्स पर आपका या आपकी कंपनी का नाम लिखा है, तो उसकी वैल्यू अपने आप दोगुनी हो जाती है। यही वजह है कि कस्टमाइज़्ड हैंपर्स की डिमांड आसमान छू रही है।
बड़े ब्रांड्स फेल, लोकल बिज़नेस पास: यह कैसे हो रहा है?
आप सोच रहे होंगे कि अगर यह इतना बड़ा मार्केट है, तो अमेज़न या फ्लिपकार्ट जैसे बड़े ब्रांड्स इस पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर लेते? इसका जवाब है- ‘लोकल टच और फ्लेक्सिबिलिटी’।
एक बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी आपको रातों-रात 50 हैंपर्स कस्टमाइज़ करके नहीं दे सकती जिसमें हर बॉक्स पर अलग-अलग नाम लिखे हों और लोकल राजस्थानी टच वाली जूट की टोकरी हो।
यहीं पर लोकल बिज़नेस जीत जाते हैं। राजस्थान (जैसे जयपुर, श्रीगंगानगर) या किसी भी अन्य राज्य के छोटे शहरों में, एक होम-बेस्ड बिज़नेस ओनर 24 घंटे के अंदर क्लाइंट की पसंद के हिसाब से रिबन, टैग और प्रोडक्ट्स बदल सकता है। यह एजिलिटी (agility) बड़े ब्रांड्स के पास नहीं है।
असली पैसा कहाँ है? (टारगेट ऑडियंस को समझें)
अगर आप इस सेक्टर में एंट्री करने की सोच रहे हैं, तो आपको समझना होगा कि पैसा सिर्फ दीवाली पर नहीं बनता। 2026 में यह एक 365 दिन चलने वाला बिज़नेस बन चुका है।
1. वेडिंग और इवेंट मार्केट (सबसे बड़ा वॉल्यूम): भारत में शादियां एक इंडस्ट्री हैं। आज वेलकम हैंपर्स, मेहंदी और हल्दी के रिटर्न गिफ्ट्स, या बेबी शॉवर के लिए थीम बेस्ड हैंपर्स एक स्टेटस सिंबल बन गए हैं। अगर आपने एक वेडिंग प्लानर के साथ टाई-अप कर लिया, तो एक ही ऑर्डर में 100-500 हैंपर्स का काम मिल सकता है।
2. कॉरपोरेट और MSME गिफ्टिंग: इसे सिर्फ मल्टीनेशनल कंपनियों तक सीमित मत समझिए। आपके शहर के बड़े डॉक्टर्स, CA फर्म्स, कोचिंग सेंटर, प्राइवेट अस्पताल और लोकल फैक्ट्री ओनर्स अपने स्टाफ और VIP क्लाइंट्स को न्यू ईयर या दीवाली पर गिफ्ट्स देते हैं। इन्हें लोकल और क्वालिटी हैंपर्स की हमेशा तलाश रहती है।
3. थीम और वेलनेस हैंपर्स: इको-फ्रेंडली चीज़ों का चलन पीक पर है। प्लास्टिक फ्री पैकेजिंग, बैंबू बास्केट, जूट बैग्स, हैंडमेड सोप और सोय कैंडल्स (soy candles) वाले हैंपर्स प्रीमियम कीमत पर बिकते हैं। इनमें मार्जिन सबसे ज्यादा होता है।
बिज़नेस का गणित: ₹10,000 के निवेश से शुरुआत कितनी सच है?
जब भी कोई कहता है कि बिज़नेस 10-15 हज़ार रुपये में शुरू हो सकता है, तो अक्सर शक होता है। लेकिन सर्विस और असेंबलिंग मॉडल (Service & Assembling Model) में यह पूरी तरह सच है।
इस बिज़नेस में आपको मैन्युफैक्चरिंग नहीं करनी है, आपको सिर्फ ‘क्यूरेशन’ (Curation) और ‘पैकेजिंग’ करनी है।
एक प्रैक्टिकल ब्रेकअप समझिए (शुरुआती 20-30 हैंपर्स के लिए):
- रॉ मटेरियल (चॉकलेट, कॉफी, स्नैक्स आदि): ₹6,000 – ₹12,000
- पैकेजिंग (बॉक्सेस, रिबन, फिलर्स, बास्केट): ₹3,000 – ₹6,000
- ब्रांडिंग (लोगो स्टिकर, विजिटिंग कार्ड, कैनवा डिज़ाइन): ₹1,000 – ₹2,000
- शुरुआती मार्केटिंग: ₹1,000 – ₹2,000
अगर आपका एक हैंपर बनाने का खर्च ₹400 आ रहा है, तो आप उसे आसानी से ₹700-₹800 में बेच सकते हैं। यानी हर हैंपर पर लगभग 40% से 50% का ग्रॉस मार्जिन। 20 हैंपर्स पर ही आप ₹6,000 से ₹8,000 का ग्रॉस प्रॉफिट निकाल सकते हैं। होम-बेस्ड मॉडल होने के कारण आपका कोई फिक्स्ड रेंट या बड़ा ओवरहेड नहीं होता।
ऑपरेशन्स और सप्लाई चेन का सीक्रेट
प्रॉफिट मार्जिन तभी बचेगा जब आपकी सोर्सिंग सही होगी। रिटेल दुकानों से सामान खरीदकर आप प्रॉफिट नहीं कमा सकते।
- लोकल मंडी और होलसेलर्स: एफएमसीजी (FMCG) डिस्ट्रीब्यूटर्स से बल्क रेट पर सामान लें।
- B2B प्लेटफॉर्म्स: उड़ान (Udaan) या इंडियामार्ट (IndiaMART) का इस्तेमाल करें।
- पैकेजिंग मटेरियल: इसे भी बल्क में खरीदें। दिल्ली के सदर बाज़ार या लोकल होलसेल मार्केट से सीधा संपर्क करें।
अगर आप खाने-पीने की चीज़ें (खासकर खुद के बनाए स्नैक्स) पैक कर रहे हैं, तो एक बेसिक FSSAI रजिस्ट्रेशन ज़रूर करवा लें। यह कस्टमर्स का भरोसा जीतता है। जब टर्नओवर बढ़ने लगे, तब GST रजिस्ट्रेशन भी करवा लें ताकि बड़ी कंपनियों के कॉरपोरेट ऑर्डर्स लिए जा सकें।
मार्केटिंग का नया तरीका: बिना वेबसाइट के सेल्स कैसे लाएं?
2026 में शुरुआत करने के लिए आपको महंगी ई-कॉमर्स वेबसाइट की कोई ज़रूरत नहीं है। आपका स्मार्टफोन ही आपका स्टोर है।
1. व्हाट्सएप कैटलॉग (WhatsApp Business): 3-5 अलग-अलग प्राइस रेंज (जैसे ₹499, ₹899, ₹1,499) के सैंपल हैंपर्स बनाइए। अच्छी नेचुरल लाइट में फोटो खींचकर व्हाट्सएप कैटलॉग में अपलोड कीजिए। पेमेंट के लिए UPI लिंक या QR कोड का इस्तेमाल करें।
2. इंस्टाग्राम की ताकत: ‘Aesthetic’ वीडियो और रील्स बनाइए। “Custom hampers in Jaipur” या आपके शहर के नाम के साथ हैशटैग लगाइए। लोग प्रोसेस वीडियो (हैंपर पैक करते हुए) देखना बहुत पसंद करते हैं।
3. लोकल नेटवर्किंग (क्रॉस-प्रमोशन): अपने शहर की फेमस बेकरी, बुटीक, ब्यूटी सैलून और इवेंट फोटोग्राफर्स से मिलिए। उन्हें अपने हैंपर्स का डिस्प्ले रखने को कहिए और हर सेल पर एक फिक्स कमीशन ऑफर कीजिए। यह सबसे पावरफुल ऑफलाइन मार्केटिंग है।
स्केल-अप: एक कमरे से मैन्युफैक्चरिंग यूनिट तक का सफर
जब आपके पास रेगुलर कॉरपोरेट ऑर्डर्स आने लगें और त्योहारों पर डिमांड आपके घर की कैपेसिटी से बाहर हो जाए, तब इसे एक छोटी मैन्युफैक्चरिंग या असेंबलिंग यूनिट में शिफ्ट किया जा सकता है।
इसमें लगभग ₹2.5 लाख से ₹5 लाख तक का निवेश लग सकता है। इसमें बड़ी इन्वेंट्री, पैकेजिंग मशीनरी, कमर्शियल स्पेस और लेबर शामिल होती है। इस स्टेज पर आकर सीज़न के दौरान ₹80,000 से ₹3 लाख तक का मंथली नेट प्रॉफिट निकालना पूरी तरह संभव है। अमेज़न या फ्लिपकार्ट पर लिस्टिंग इसी फेज़ में करनी चाहिए।
छोटे बिज़नेस ओनर्स को इससे क्या सीखना चाहिए?
गिफ्ट हैंपर मार्केट का यह बूम हमें एक बहुत बड़ा बिज़नेस लेसन देता है- कस्टमर अब प्रोडक्ट नहीं, बल्कि उसके पीछे की ‘कहानी’ और ‘पर्सनल फील’ खरीद रहा है।
चाहे आपका बिज़नेस कपड़ों का हो, जूलरी का हो या फूड का, अगर आप अपने प्रोडक्ट में एक ‘पर्सनलाइज़्ड टच’ और बेहतरीन पैकेजिंग जोड़ देते हैं, तो आप उसी प्रोडक्ट को 30-40% प्रीमियम कीमत पर बेच सकते हैं।
कस्टमाइज़ेशन अब कोई ‘लक्ज़री’ नहीं रही, यह कस्टमर की ‘बेसिक डिमांड’ बन चुकी है।
अगर आप एक नया बिज़नेस शुरू करने की सोच रहे हैं, तो खुद से यह सवाल पूछिए, क्या आप ₹10,000 लगाकर ‘फेस्टिवल हैंपर्स’ के साथ शुरुआत करना चाहेंगे, या फिर B2B नेटवर्क बनाकर ‘कॉरपोरेट हैंपर्स’ की बड़ी डील क्रैक करने का रिस्क लेंगे? बाज़ार तैयार है, क्या आप अपनी पहली बास्केट पैक करने के लिए तैयार हैं?










