₹1 लाख/किलो बिकती है यह फसल: नौकरी छोड़ इंजीनियर ने 200 sq ft कमरे में शुरू की खेती, अब छाप रहे नोट

December 28, 2025 7:48 AM
shailesh modak cordyceps mushroom farming success story pune

आमतौर पर जब हम खेती की बात करते हैं, तो दिमाग में कई एकड़ जमीन, ट्रैक्टर और कड़ी धूप की तस्वीर आती है। लेकिन पुणे के शैलेश मोदक ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। एक पूर्व सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जिन्होंने एसी केबिन वाली नौकरी छोड़ी और अब 10×10 के कमरे से साल भर में लाखों रुपये कमा रहे हैं।

शैलेश उगा रहे हैं Cordyceps Mushroom, जिसे दुनिया ‘हिमालयन गोल्ड’ या ‘कीड़ा जड़ी’ के नाम से जानती है। बाजार में इसकी कीमत ₹1 लाख प्रति किलो तक है। आइए जानते हैं उनकी सफलता का राज और इस मुनाफे वाली खेती का पूरा गणित।

क्या है खबर? इंजीनियर से किसान बनने का सफर

पुणे के शैलेश मोदक पहले एक साधारण आईटी प्रोफेशनल थे। खेती का जुनून उन्हें खींच लाया, लेकिन रास्ता आसान नहीं था। उन्होंने पहले मधुमक्खी पालन (Beekeeping), स्ट्रॉबेरी और हाइड्रोपोनिक्स (बिना मिट्टी की खेती) में हाथ आजमाया, लेकिन सफलता नहीं मिली। कई बार फेल होने के बाद उन्हें ‘कॉर्डिसेप्स मिलिटेरिस’ (Cordyceps Militaris) के बारे में पता चला।

आज उनका वेंचर ‘365Dfarms’ सालाना लगभग ₹12 लाख का रेवेन्यू जनरेट कर रहा है। सबसे खास बात? यह खेती खेतों में नहीं, बल्कि लैब जैसे नियंत्रित माहौल में कांच की बोतलों के अंदर होती है।

₹1 लाख/किलो क्यों है कीमत?

कॉर्डिसेप्स कोई आम मशरूम नहीं है। इसका इस्तेमाल पारंपरिक एशियाई दवाओं और एथलीट्स द्वारा एनर्जी बूस्टर के रूप में किया जाता है। इसकी भारी मांग और कम उत्पादन के कारण इसका भाव ₹90,000 से ₹1.20 लाख प्रति किलो तक रहता है।

गणित सीधा है: अगर आप महीने में सिर्फ 1.5 किलो सूखी कॉर्डिसेप्स भी उगा लेते हैं, तो आप महीने का ₹1.35 लाख तक कमा सकते हैं। शैलेश सालाना 12-13 किलो उत्पादन कर रहे हैं, जो एक छोटे से सेटअप के लिए बहुत बड़ा मुनाफा है।

खेती या साइंस लैब? कैसे होती है ये खेती?

कॉर्डिसेप्स उगाने के लिए आपको खेत की नहीं, एक ‘क्लाइमेट कंट्रोल’ कमरे की जरूरत होती है।

  • सबस्ट्रेट (मिट्टी की जगह): इसे ब्राउन राइस (Brown Rice) और खास न्यूट्रिएंट्स के घोल में उगाया जाता है।
  • उपकरण: कांच की बोतलें (Jars), ऑटोक्लेव (Sterilization के लिए) और 24 घंटे AC (तापमान 16-24°C रखने के लिए)।
  • प्रक्रिया: 60-90 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। अंधेरे और रोशनी का सही संतुलन (Dark & Light Cycle) ही इसमें जान डालता है।

सावधानी: यह ‘आसान पैसा’ नहीं है

शैलेश की सफलता का राज उनकी ट्रेनिंग है। उन्होंने ‘IISER सोलन’ से इसकी वैज्ञानिक ट्रेनिंग ली। विशेषज्ञों के अनुसार, इस खेती में सबसे बड़ा दुश्मन ‘कंटैमिनेशन’ (फंगस/बैक्टीरिया) है।

चूंकि यह लैब में होती है, इसलिए अगर सफाई में थोड़ी भी चूक हुई, तो पूरी फसल ‘ट्राइकोडर्मा’ (हरा फफूंद) या अन्य बीमारियों से बर्बाद हो सकती है। यह खेती एक अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर जैसी सफाई मांगती है।

सबसे बड़ा फायदा: खराब नहीं होती फसल

टमाटर या स्ट्रॉबेरी की तरह इसे जल्दी बेचने की टेंशन नहीं होती। सूखी हुई कॉर्डिसेप्स की शेल्फ लाइफ 1.5 साल तक होती है। यानी किसान इसे स्टोर कर सकता है और जब बाज़ार में सही दाम मिले, तब बेच सकता है। शैलेश मोदक की कहानी साबित करती है कि अगर सही तकनीक और ट्रेनिंग हो, तो खेती में भी कॉर्पोरेट से ज्यादा कमाई संभव है।

राहुल शर्मा

मैं पिछले 3 सालों से कृषि और एग्री-बिज़नेस की जानकारी लोगों तक पहुँचा रहा हूँ। मैं किसानों और नए एग्री उद्यमियों के लिए उपयोगी व आसान भाषा में आर्टिकल्स लिखता हूँ। मेरे लेख पढ़कर आप खेती और कृषि-व्यापार को बेहतर समझ पाएँगे।

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